Sunday, May 3, 2020

वो शाम

                              वो शाम..

सोमवार का दिन था सुबह के ५ बज रहे थे।आज जल्दी उठ गया था या यूं कहूं तो सोया ही नहीं था।
मैंने फोन लिया और रैना को फोन किया।हमारी शादी को एक महीने रह गए थे।
हैलो रैना...! मै रंजीत ।
रैना: जी ।आपका नो सेव है।क्या बात है इतने सुबह सुंबह
सब ठीक तो है ना
रंजीत:हा सब ठीक है बस तुम्हारी याद अारही थी तो बात करने का मन किया इसलिए फोन किया।
हमने कुछ देर बातें की तब तक सब उठ चुके थे उसके भी और मेरे भी घर के लोग तो फोन रख दिया।
आज बहुत बेचैनी सी हो रही थी।
दरअसल याद मुझे रैना की नहीं बल्कि
खुशी की अाराही थी।
खुशी मेरी बचपन की दोस्त।और शायद जिसे मै प्यार करता था मगर जब तक मै उसे ये बताता तब तक बहुत देर हो चुकी थी।उसकी शादी कहीं और तय हो गई।और वो चली गई।
मेरे फोन में उसका नंबर सेव था।मैंने कुछ सोचा और उसे फोन किया दो रिंग के बाद फोन रख दिया।शायद हिचकिचा रहा था उससे बात करने को।
कुछ देर बाद उसने खुद फोन किया
खुशी:क्या बात है बहुत दिन बाद याद किया इस दोस्त को।
रंजीत:हा वो मेरी शादी हो रही है।और बहुत याद आरहीं थी तेरी तो फोन कर लिया।
खुशी: hmm कंग्रॅजुलेशन.कब है शादी ?
रंजीत:आज से ठीक एक महीने बाद 18 मे।
खुशी: अरे उस दिन तो तुम्हारा जन्मदिन भी है सही है जन्मदिन और सालगिराह एक ही दिन।
रंजीत:तुझे याद है "वो शाम"
खुशी:कैसे भूल सकती हूं।उसी शाम तो मुझे पता चला कि तुम मुझसे प्यार करते हो मगर तुमने कहा बताया था मैंने तो खुद जान लिया था।
हां वो (मै ज़रा हिचकिचाया और थोड़ी बात कर फोन रख दिया)
आज सच में वो शाम बहुत याद आराहि थी।
लगभग ५ बज रहे थे शाम के मैंने अपना फोन वॉलेट उठाया और निकल पड़ा घर से।
और वही गया जहां मै और खुशी अक्सर बैठते थे।समुंदर किनारे उन दो नारियल के पेड़ों के बीच जो थे तो अलग अलग मगर ऊपर जाकर एक दूसरे से मिल गए थे ।
हम घंटो बातें करते और समय का याद ही नहीं रहता।
उस शाम कुछ ६/६:३० बज रहे थे ,अंधेरा होने को चला था
और हम एक दूसरे का हाथ पकड़ पीछे चट्टान के सहारे बैठे समंदर की लहरों को देख रहे थे,मानो जैसे समंदर में लहरें उठती हैं बिल्कुल वैसी ही हमारे मन में भी तरंगें उठ रही थीं।उस शाम हमारे दिल एक हो चुके थे। हम ये जानते थी की हमारा मिलन नहीं लिखा है मगर वो शाम हम बस एक दूसरे के होकर एक दूसरे की बाहों में जी लेना चाहते थे।
हमने काफी बातें की,वो अपना हाथ मेरे हाथों मै रख अपना सिर मेरे कांधे से सटा आँखने बंद कर बस उस शाम को महसूस कर रही थी।हम अलग होना नहीं चाहते थे हम चाहते तो भाग कर शादी कर लेते और सब से दूर अपनी दुनिया बसा लेते।मगर हम नहीं चाहते थे ऐसा हम नहीं चाहते थे कि हमारे बाद हमारे माता पिता को दुख हो और उनकी बेज्जती हो ।
हम भले ही एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे मगर हम कोई ऐसा कदम नहीं उठा सकते थे।
हम बस यूंही बैठे पुरानी बातें करते और बस एक दूसरे के होकर रह गए।वो शाम बहुत अनोखी थी।

मैं वहीं अकेला बैठा उसे याद कर रहा था कि खुशी का फोन आया ,जो बीत गया उसे भूल जाओ,मै अब किसी और कि हूं और तुम भी किसी और के होने वाले हो,उससे प्यार करना और उसे वो सारी खुशियां देना जो तुम मुझे देना चाहते थे।
ये बोल उसने फोन रख दिया और मै वाहा से उठ घर आगया।

मेरे छोटे भाई को सब पता था मेरे बारे में
उसने सिर्फ एक सवाल किया मुझसे,
भाई इतना प्यार करते थे तो तुमने उसे जाने क्यों दिया?

प्यार था तभी जाने दिया
चाहत होती
तो आज वो मेरे गले लग रही होती..।


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